Ganesh Chaturthi - गणेश चतुर्थी

Ganesh Chaturthi or Ganesh Utsav is celebrated as the birthday of Lord Ganesh (the elephant-headed God of Wisdom and Prosperity and the son of Lord Shiva and Ma Parvati). This festival falls on the fourth day (Chaturthi) of the bright fortnight of Bhadrapada month of the Hindu calendar around August-September. It is celebrated all across India and is the biggest festival in Maharashtra. Ganesh Chaturti is celebrated for a period of ten days. Fasting, feasting and distribution of sweets offered to Lord Ganesh are important aspects of Ganesh chaturthi rituals in India. Hindus pray to images of Lord Ganesha. Praying to Lord Ganesh during the festival will bring good luck and prosperity for the family.

Ganesh Chaturthi Katha - Fast Story - गणेश चतुर्थी व्रत कथा

एक समय जब माता पार्वती मानसरोवर में स्नान कर रही थी तब उन्होंने स्नान स्थल पर कोई आ न सके इस हेतु अपनी माया से गणेश को जन्म देकर 'बाल गणेश' को पहरा देने के लिए नियुक्त कर दिया।इसी दौरान भगवान शिव उधर आ जाते हैं।

गणेशजी उन्हें रोक कर कहते हैं कि आप उधर नहीं जा सकते हैं। यह सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो जाते हैं और गणेश जी को रास्ते से हटने का कहते हैं किंतु गणेश जी अड़े रहते हैं तब दोनों में युद्ध हो जाता है।

युद्ध के दौरान क्रोधित होकर शिवजी बाल गणेश का सिर धड़ से अलग कर देते हैं।शिव के इस कृत्य का जब पार्वती को पता चलता है तो वे विलाप और क्रोध से प्रलय का सृजन करते हुए कहती है कि तुमने मेरे पुत्र को मार डाला। माता का रौद्र रूप देख शिव एक हाथी का सिर गणेश के धड़ से जोड़कर गणेश जी को पुन:जीवित कर देते हैं।

तभी से भगवान गणेश को गजानन गणेश कहा जाने लगा।

इस व्रत को करने से मनुष्‍य के सारे कष्ट दूर होकर मनुष्य को समस्त सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह सहायता मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेशजी भी बैठे थे।



देवताओं की बात सुनकर शिवजी ने कार्तिकेय व गणेशजी से पूछा कि तुममें से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेशजी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की सहायता के लिए पहले जाएगा। भगवान शिव के मुख से यह वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। परंतु गणेशजी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा।

तभी उन्हें एक उपाय सूझा। गणेश जी अपने स्थान से उठे और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिवजी ने श्रीगणेश से पृथ्वी की परिक्रमा न करने का कारण पूछा।

तब गणेश जी ने कहा – ‘माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं।’

यह सुनकर भगवान शिव ने गणेशजी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेशजी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

  एकदन्त दयावन्त चारभुजाधारी
माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी।

पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

  अन्धे को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ।।

'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

जय देव,जय देव,जय मंगलमूर्ति
दर्शन मात्र मनकामना पूर्ति।।

आरती गजवदन विनायक की।
सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥

एकदंत, शशिभाल, गजानन,
विघ्नविनाशक, शुभगुण कानन,
शिवसुत, वन्द्यमान-चतुरानन,
दु:खविनाशक, सुखदायक की॥
आरती गजवदन विनायक की।
सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥

ऋद्धि-सिद्धि स्वामी समर्थ अति,
विमल बुद्धि दाता सुविमल-मति,
अघ-वन-दहन, अमल अविगत गति,
विद्या, विनय-विभव दायक की॥
आरती गजवदन विनायक की।
सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥

पिंगलनयन, विशाल शुंडधर,
धूम्रवर्ण, शुचि वज्रांकुश-कर,
लम्बोदर, बाधा-विपत्ति-हर,
सुर-वन्दित सब विधि लायक की॥
आरती गजवदन विनायक की।
सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥

आरती गजवदन विनायक की।
सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥


आरती कीजे श्री गौरी नंदन की
शिव के सूत गजबदन विनायक

एक दन्त प्रभु अंकुश धारी
काटो संकट प्रभु पीड़ा हे भारी
हैं प्रथमेश अब सुनो हमारी

प्रेम तुम्हारा बस हमने चाहा
जग सारा ये तेरी ही माया

जिव लोग से हमे उबारो
अबकी बारी भाव से प्रभु तारो

सभी देवो के तुम प्रभु राजा
शक्ति के पुत्र प्रभु कृपा निथान

शिव के अंश क्षमा करो कर्म
मूषक वहां हो सवार हे गनेस

करो भाव से पार जय श्री गणेश

ॐ जय गौरी नंदन, प्रभु जय गौरी नंदन |
गणपति विघ्न निकंदन, मंगल निःस्पंदन || ॐ जय ||

ऋद्धि सिद्धियाँ जिनके, नित ही चंवर करे |
करिवर मुख सुखकारक, गणपति विघ्न हरे || ॐ जय ||

देवगणों में पहले तव पूजा होती |
तब मुख छवि भक्तो के निदारिद खोती || ॐ जय ||

गुड़ का भोग लगत हैं कर मोदक सोहे |
ऋद्धि सिद्धि सह-शोभित, त्रिभुवन मन मोहै || ॐ जय ||

लंबोदर भय हारी, भक्तो के त्राता |
मातृ-भक्त हो तुम्ही, वाँछित फल दाता || ॐ जय ||

मूषक वाहन राजत, कनक छत्रधारी |
विघ्नारण्यदवानल, शुभ मंगलकारी || ॐ जय ||

धरणीधर कृत आरती गणपति की गावे |
सुख संपत्ति युक्त होकर वह वांछित पावे || ॐ जय ||


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